ज़ख्मों की अमीरी है, किस्मत की फकीरी है
मेरे दिल की सल्तनत भी अश्कों से गीली है
हर चोट ने सिखला दी जीने की नई आदत,
दर्दों के जखीरे को तक़दीर ने अता की है
चेहरों पे हँसी लेकिन आँखों में धुआँ सा है
महफ़िल तो सजी पूरी, पर रूह अकेली है
हमने तो वफ़ाओं की हर रस्म निभाई थी,
उनकी ही निगाहों में कुछ बात अधूरी है
पत्थर से जो टकराए आवाज़ तो आनी थी,
खामोश मुहब्बत भी अंदर से चीखी है
अजय ये दुनिया भी, क्या खूब तमाशा है,
जो सच पे अड़ा ठहरा वो शख़्स बुरा ही है
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